किसान विरोधी है केंद्रीय बजट, प्रतियां जलाकर जताएंगे विरोध : कुलदीप तंवर
हिमाचल किसान सभा ने केंद्रीय बजट को बताया खोखला
कृषि को फिर हाशिए पर डाला, किसानों की आय बढ़ाने का वादा केवल दिखावा
कहा, कर्ज माफी पर कोई प्रस्ताव नहीं, उर्वरक सब्सिडी में ₹15,679 करोड़ की कटौती
आपकी खबर, शिमला।
1 फरवरी। केंद्रीय बजट 2026–27 में एक बार फिर हर वर्ग विशेषकर किसानों को निराशा ही हाथ लगी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण में कृषि का केवल औपचारिक उल्लेख किया गया। छोटे और सीमांत किसानों का नाम मात्र एक बार लिया गया, जबकि ग्रामीण मजदूरों का तो पूरी तरह से उल्लेख ही नहीं किया गया। बजट के आंकड़े इस उपेक्षा की स्पष्ट पुष्टि करते हैं।
हिमाचल किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह तंवर ने कहा कि इस सप्ताह प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के अनुसार, कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई है। पिछले तिमाही में यह दर 3.5 प्रतिशत रही, जो कि पिछले दस वर्षों की औसत 4.45 प्रतिशत वृद्धि दर से काफी कम है। फसल उत्पादन में सबसे अधिक गिरावट देखी गई है। कृषि क्षेत्र में इस ठहराव और संकट की स्थिति में यह अपेक्षित था कि केंद्रीय बजट 2026–27 कुछ राहत और गति प्रदान करेगा, किंतु बजट ने एक बार फिर किसानों को निराश किया है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के लिए कुल बजटीय आवंटन लगभग ₹1.40 लाख करोड़ रखा गया है, जो संशोधित अनुमान (RE) 2025–26 की तुलना में केवल 5.3 प्रतिशत की नाममात्र वृद्धि है। महँगाई को ध्यान में रखने पर कृषि क्षेत्र के लिए वास्तविक आवंटन में कोई ठोस वृद्धि नहीं दिखाई देती।
आर्थिक सर्वेक्षण यह भी स्वीकार करता है कि अनाज, मक्का, सोयाबीन और दालों सहित विभिन्न फसलों की उत्पादकता वैश्विक औसत से काफी कम है, जिससे भारतीय कृषि लगातार अलाभकारी होती जा रही है। इसके बावजूद, कृषि अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने हेतु बजट में कोई अतिरिक्त सहायता नहीं दी गई है। कृषि उत्पादकता बढ़ाने को “कर्तव्य” बताने के बावजूद, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के लिए आवंटन को ₹10,281 करोड़ (RE 2025–26) से घटाकर ₹9,967 करोड़ (BE 2026–27) कर दिया गया है।
इस वर्ष के बजट में भी नक़दी फसलों में निवेश की बयानबाजी जारी रही। वित्त मंत्री ने नारियल, कोको, काजू, नट्स और चंदन पर ज़ोर दिया, किंतु हकीकत में कपास प्रौद्योगिकी मिशन, दलहन मिशन, हाइब्रिड बीज कार्यक्रम और मखाना बोर्ड जैसी पहले घोषित योजनाओं का बजटीय प्रावधानों में कोई उल्लेख नहीं है।
किसानों को राहत देने के संदर्भ में बजट पूरी तरह विफल रहा है। उर्वरक सब्सिडी को ₹1,86,460 करोड़ (RE 2025–26) से घटाकर ₹1,70,781 करोड़ (BE 2026–27) कर दिया गया है, अर्थात ₹15,679 करोड़ की भारी कटौती। खाद्य सब्सिडी में भी पूर्ववर्ती वर्षों के संशोधित अनुमानों की तुलना में कमी की गई है।
चिंताजनक तथ्य यह है कि बजट भाषण में न तो मनरेगा का कोई उल्लेख किया गया और न ही हाल ही में पारित VB-GRAMG योजना का, जो ग्रामीण रोजगार के प्रति सरकार की पूर्ण उदासीनता को दर्शाता है। VB-GRAMG योजना के लिए ₹95,692 करोड़ का आवंटन किया गया है, जो केंद्र सरकार के 60 प्रतिशत हिस्से को दर्शाता है। शेष ₹63,794 करोड़ से अधिक का भारी वित्तीय बोझ राज्यों पर डाल दिया गया है।
उन्होंने कहा कि आर्थिक समीक्षा 2025–26 के अनुसार, अधिशेष राज्यों की संख्या 2018–19 में 19 से घटकर 2023–24 में केवल 11 रह गई है। राज्यों द्वारा लगातार 50 प्रतिशत हिस्सेदारी की माँग किए जाने के बावजूद, 16वें वित्त आयोग ने केवल 41 प्रतिशत हिस्सेदारी का प्रस्ताव किया है। वित्तीय स्वायत्तता से वंचित राज्य सरकारें रोजगार गारंटी योजनाओं के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने में असमर्थ होंगी। VB-GRAMG अधिनियम के अंतर्गत ग्रामीण जनता को पहले मनरेगा के तहत मिलने वाले औसतन 47 दिनों का रोजगार भी सुनिश्चित नहीं हो पाएगा। यह ग्रामीण मजदूरों और किसानों पर गंभीर हमला है तथा संघीय अधिकारों का खुला उल्लंघन है, जिसे किसान समाज स्वीकार नहीं करेगा।
ग्रामीण रोजगार से संबंधित एकमात्र प्रमुख घोषणा महात्मा गांधी ग्राम स्वराज योजना की रही, जिसका उद्देश्य ग्राम उद्योगों को बढ़ावा देना है, किंतु इसके लिए कोई ठोस वित्तीय प्रावधान नहीं किया गया।
डॉ. तंवर ने कहा कि अखिल भारतीय किसान सभा किसानों, ग्रामीण मजदूरों और आम जनता से आह्वान करती है कि वे इस किसान-विरोधी, मजदूर-विरोधी और संघवाद-विरोधी केंद्रीय बजट 2026–27 के खिलाफ 3 फरवरी 2026 (या किसी भी उपयुक्त आगामी तिथि) को गाँवों और तहसीलों में बजट की प्रतियाँ जलाकर विरोध दर्ज करें। AIKS सभी से यह भी अपील करती है कि 12 फरवरी 2026 की आम हड़ताल को पूर्ण रूप से सफल बनाकर जनविरोधी बजट के खिलाफ जनता के आक्रोश को मज़बूती से अभिव्यक्त किया जाए।

