
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हंगामे पर कांग्रेस घिरी, कथनी और करनी में अंतर का आरोप
दूसरों को नसीहत, खुद सदन में नारेबाजी? कांग्रेस पर उठे सवाल
विधानसभा में हंगामे को लेकर कांग्रेस पर निशाना, “पहले खुद अमल करे फिर दे नसीहत”
आपकी खबर, ब्यूरो।
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर विधानसभा के शरदकालीन सत्र के पहले दिन सदन में जमकर हंगामा और नारेबाजी देखने को मिली। विपक्षी भाजपा विधायकों ने बिजली दरों में बढ़ोतरी, कर्मचारियों की मांगों और अन्य मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध जताया। इसके जवाब में सत्ता पक्ष के सदस्यों ने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर नारेबाजी की। हंगामे के चलते विधानसभा की कार्यवाही भी बाधित हुई।
इसी घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस पर राजनीतिक सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि विधानसभा में हंगामे और व्यवधान को लेकर सवाल उठाने वाले कांग्रेस नेता स्वयं उसी सदन में विरोध और नारेबाजी का हिस्सा बनते दिखाई दिए।
भाजपा की ओर से इसे कांग्रेस की “कथनी और करनी में अंतर” का उदाहरण बताया जा रहा है। उनका कहना है कि यदि विपक्षी दल विधानसभा की कार्यवाही में व्यवधान को लेकर दूसरे दलों पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें स्वयं भी सदन की मर्यादा और कार्यवाही के नियमों का पालन करना चाहिए।
राजनीतिक तौर पर इस घटनाक्रम ने एक बार फिर विधानसभा के भीतर विरोध-प्रदर्शन की शैली को लेकर बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि जनहित के मुद्दों को सदन में उठाने का अधिकार सभी दलों को है, लेकिन क्या इसके लिए नारेबाजी और हंगामे का सहारा लिया जाना उचित है?
आलोचकों का तर्क है कि दूसरों को नसीहत तभी प्रभावी होती है, जब उसे देने वाला पक्ष स्वयं भी उसी कसौटी पर खरा उतरे। इसी आधार पर कांग्रेस नेताओं के पूर्व बयानों और विधानसभा में उनके व्यवहार को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
वहीं, विधानसभा में पहले दिन हुए घटनाक्रम में विभिन्न दलों के सदस्य अपने-अपने मुद्दों को लेकर विरोध करते नजर आए। लगातार नारेबाजी और विरोध के बीच स्पीकर ने सदस्यों से अपनी सीटों पर लौटने और सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलने देने की अपील की। इसके बावजूद हंगामा जारी रहने पर कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।
