
कुल्लू दशहरा: देव आस्था के आगे नतमस्तक हुई घाटी, 269 देवी-देवताओं के आगमन से ढालपुर बना देवलोक
रघुनाथ जी की रथयात्रा के साथ शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव, ढोल-नगाड़ों की गूंज और देव मिलन ने बांधा समां
आपकी खबर, ब्यूरो।
कुल्लू, 22 अक्तूबर। देवभूमि कुल्लू में वीरवार को आस्था और देव परंपराओं का ऐसा अद्भुत नजारा देखने को मिला, जिसने पूरी घाटी को भक्तिरस में सराबोर कर दिया। भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा के साथ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का आगाज हुआ तो ऐतिहासिक ढालपुर मैदान देवी-देवताओं के जयकारों से गूंज उठा। उत्सव में 269 देवी-देवताओं के पहुंचने से कुल्लू की देव संस्कृति की भव्यता एक बार फिर दुनिया के सामने आई।
सजी-धजी पालकियां, आकर्षक देव रथ, पारंपरिक वेशभूषा में सजे देवलु और ढोल-नगाड़ों की गूंज ने पूरे वातावरण को अलौकिक बना दिया। हर तरफ देवी-देवताओं के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रही। देव परंपराओं के इस अनूठे संगम को देखने के लिए स्थानीय लोगों के साथ बाहरी क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालुओं में भी खासा उत्साह देखने को मिला।
देव रथों के साथ उमड़ा जनसैलाब, आस्था के रंग में रंगा ढालपुर
भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा उत्सव का मुख्य आकर्षण रही। पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच रथयात्रा आगे बढ़ी तो श्रद्धालुओं ने जयकारों के साथ भगवान का स्वागत किया। ढालपुर मैदान में उमड़ी भीड़ और चारों ओर नजर आते देव रथों ने उत्सव की भव्यता को और बढ़ा दिया।
देवभूमि की विशेष पहचान मानी जाने वाली देव परंपरा यहां पूरी जीवंतता के साथ नजर आई। देवी-देवताओं के साथ पहुंचे देवलुओं की मौजूदगी ने उत्सव को केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित न रखते हुए इसे हिमाचल की समृद्ध लोक संस्कृति का बड़ा उत्सव बना दिया।
देवी भुवनेश्वरी जगन्नाथी के इशारे के बाद आगे बढ़ा रथ
कुल्लू दशहरे की परंपराओं में देवी-देवताओं के संकेतों का विशेष महत्व है। इस बार देवी भुवनेश्वरी जगन्नाथी का इशारा मिलने के बाद भव्य रथ के आगे बढ़ने का दृश्य भी आकर्षण का केंद्र रहा। वहीं, देवता नाग धुंबल की भूमिका ने देव परंपराओं की विशिष्टता को उजागर किया। इन परंपराओं के बीच श्रद्धालुओं को कुल्लू की प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के दर्शन हुए।
देव मिलन ने दिखाई कुल्लू की सांस्कृतिक विरासत
दशहरा उत्सव में विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे देवी-देवताओं का मिलन लोगों के लिए विशेष आकर्षण रहा। रंग-बिरंगी छतरियों, फूलों से सजी पालकियों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनों के बीच देवताओं का आगमन उत्सव को खास बनाता रहा। देवी हिडिंबा के आगमन से भी उत्सव की रौनक बढ़ी।
कुल्लू दशहरा सदियों से चली आ रही देव संस्कृति, लोक आस्था और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। यहां की परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हुए आज भी लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े हुए हैं।
देवभूमि की पहचान, दुनिया के लिए आकर्षण
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा अपनी विशिष्ट देव परंपराओं के कारण देश-विदेश में अलग पहचान रखता है। 269 देवी-देवताओं की मौजूदगी, भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा और देव मिलन की परंपरा ने एक बार फिर साबित किया कि कुल्लू की सांस्कृतिक विरासत कितनी समृद्ध है।
ढालपुर में उमड़ा जनसैलाब, देव रथों की भव्यता और गूंजते जयकारे इस बात के साक्षी बने कि कुल्लू दशहरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि देवभूमि की आस्था, पहचान और परंपराओं का जीवंत प्रतीक है।
