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    चंबा के पांगी में 15 दिवसीय जुकारू उत्सव का आगाज, भाईचारे और आस्था का अनूठा पर्व शुरू

    पांगी घाटी में पारंपरिक जुकारू उत्सव शुरू: राजा बलि की पूजा से 15 दिन तक गूंजेगी संस्कृति
    aapkikhabarBy aapkikhabarFebruary 18, 2026Updated:April 5, 2026No Comments5 Mins Read
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    चंबा के पांगी में 15 दिवसीय जुकारू उत्सव का आगाज, भाईचारे और आस्था का अनूठा पर्व शुरू

    पांगी घाटी में पारंपरिक जुकारू उत्सव शुरू: राजा बलि की पूजा से 15 दिन तक गूंजेगी संस्कृति

    जनजातीय संस्कृति की झलक: पांगी में जुकारू उत्सव का शुभारंभ, बलिराजा की आराधना से बढ़ेगा भाईचारा

    आपकी खबर, पांगी।

    18 फरवरी। जिला चंबा के जनजातीय क्षेत्र पांगी में 15 दिवसीय जुकारू उत्सव बुधवार से शुरू हो गया। पांगी जुकारू उत्सव को आपसी भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। मंगलवार मध्यरात्रि को घाटी के लोग अपने घरों की दीवारों पर बलीराजा का चित्र उकेरकर इसकी प्राण प्रतिष्ठा की गई। बीते दिन पंगवाल समूदाय के लोग अपने घरों में लिपाई पुताई करते है।  शाम को घर के मुखिया भरेस भंगड़ी और आटे के बकरे बनाता है।

    ये बनाते समय कोई किसी से बातचीत नहीं करता है। पूजा सामग्री अलग कमरे में रखी जाती है। रात्रिभोज के बाद गोबर की लिपाई की जाएगी। वहीं आज सुबह करीब तीन बजे बलीराज को गंगाजल के छिड़काव  व विषेश पूजा अर्चना के बाद बाली राजा का प्राण प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद 15 दिनों तक पांगी घाटी के लोग बलीराज की पुजा करते है। वहीं बालीराज के समक्ष चौका लगाया जाता है। गोमूत्र और गंगाजल छिड़कने के बाद गेहूं के आटे और जौ के सत्तुओं से मंडप लिखा जाता है। जिसे पंगवाली भाषा में चौका कहते है।  मंडप के सामने दिवार पर बलीराज की मूर्ति स्थापित की जाती है।

    इसे स्थानीय बोली में जन बलदानों राजा कहते हैं। आटे से बने बकरे, मेंढ़े आदि मंडप में तिनकों के सहारे रखे जाते हैं। घाटी के बाशिंदे आटे के बकरे तैयार कर राजा बलि को अर्पित करेंगे। धूप-दीये और चौक लगाकर 15 दिन तक राजा बलि की ही पूजा करेंगे। इस दौरान कुलदेवता से लेकर अन्य देवी-देवताओं की पूजा नहीं की जाती है। आज लोग एक-दूसरे के घरों में जाकर बड़े-बुजुर्गो का आशीर्वाद ले रहे है। जिसे स्थानीये भाषा में पड़ीद कहते है।

    • क्या है पांगी का जुकारू उत्स्व 

    बुधवार की पावन सुबह, जब ब्रह्म मुहूर्त का शुभ समय होता है, तब घाटी के लोग स्नानादि करके श्रद्धा और भक्ति भाव से राजा बलि के समक्ष नतमस्तक होते हैं। वातावरण में आस्था और परंपरा की सुगंध फैल जाती है। इसके पश्चात घर के छोटे सदस्य अपने बड़े सदस्यों के चरण वंदना करते हैं। बड़े स्नेहपूर्वक उन्हें आशीर्वाद देते हैं। राजा बलि की पूजा के लिए पनघट से पवित्र जल लाया जाता है और जल देवता की भी विधिवत पूजा की जाती है। इस दिन घर का मुखिया श्रद्धा के साथ गौ माता की पूजा करता है, जो समृद्धि और सुख का प्रतीक मानी जाती हैं।

    यह त्योहार केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप का भी प्रतीक है। सर्दी और बर्फबारी के कारण जो लोग लंबे समय से अपने घरों में सीमित थे, वे अब मौसम के बदलते ही एक-दूसरे से मिलने निकलते हैं। सर्दी कम होने के साथ ही रिश्तों की गर्माहट भी बढ़ जाती है।

    आज घाटी के लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते हैं और अपनापन जताते हैं। मिलते समय वे प्रेमपूर्वक कहते हैं – “तकड़ा’ ‘थिया’ न”, और विदा लेते समय कहते हैं – “मठे’ ‘मठे’ विश”। यह शब्द केवल अभिवादन नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाली भावनाएँ हैं। परंपरा के अनुसार, लोग सबसे पहले अपने बड़े भाई के घर जाते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं, फिर अन्य संबंधियों और परिचितों से मिलने का क्रम चलता है। इस प्रकार यह पर्व परिवार, सम्मान, प्रेम और सामाजिक एकता का अनुपम उदाहरण बन जाता है। तीसरा दिन मांगल या पन्हेई के रूप में मनाया जाता है ‘पन्हेई’ किलाड़ परगने में मनाई जाती है जबकि साच परगना में ‘मांगल’ मनाई जाती है। ‘मांगल’ तथा ‘पन्हेई’ में कोई विशेष अंतर नहीं होता मात्र नाम की ही भिन्नता है। मनाने का उद्देश्य एवं विधि एक जैसी ही है फर्क सिर्फ इतना है कि साच परगने मे मांगल जुकारू के तीसरे दिन मनाई जाती है तथा पन्हेई किलाड़ परगने में पांचवें दिन मनाई जाती है। मांगल तथा पन्हेई के दिन लोग भूमि पूजन के लिए निर्धारित स्थान पर इकट्ठा होते हैं इस दिन प्रत्येक घर से सत्तू घी शहद ‘मंण्डे’ आटे के बकरे तथा जौ, गेहूं आदि का बीज लाया जाता है। कहीं-कहीं शराब भी लाई जाती है

    अपने अपने घरों से लाई गई इस पूजन सामग्री को आपस में बांटा जाता है भूमि पूजन किया जाता है कहीं-कहीं नाच गान भी किया जाता है इस त्यौहार के बाद पंगवाल लोग अपने खेतों में काम करना शुरू कर देते हैं। इस मेले को ‘उवान’ ‘ईवान’ आदि नामों से भी जाना जाता है। यह मेला किलाड़ तथा धरवास पंचायत में तीन दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन मेला राजा के निमित दूसरे दिन प्रजा के लिए मनाया जाता है और तीसरा दिन नाग देवता के लिए मनाया जाता है, यह मेला माघ और फागुन मास में मनाया जाता है। उवान के दौरान स्वांग नृत्य भी होता है इस दिन नाग देवता के कारदार को स्वांग बनाया जाता है। लंबी लंबी दाढ़ी मूछ पर मुकुट पहने सिर पर लंबी-लंबी जटाएं हाथ में कटार लिए स्वांग को मेले में लाया जाता है। दिन भर नृत्य के बाद स्वांग को उसके घर पहुंचाया जाता है इसी के साथ ईवान मेला समाप्त हो जाता है।

    पंगवाल एकता मंच के अध्यक्ष त्रिलोक ठाकुर ने सभी पांगी वासियों को जुकारू उत्सव की बधाई दी हुई है। उन्होंने बताया  कि पंगवाल समुदाय के भाईचारे का प्रतीक जुकारू उत्सव का इंतजार हर पांगी वाले पूरा साल करते है। उन्होंने बताया कि इस त्यौहार को आज पांगी के लोगों पूरे प्रदेश भर में बनाते है। उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की है कि पांगी के जुकारू उत्सव को प्रदेश स्तर का दर्जा दिया जाए।

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